CJI सूर्यकांत ने की लोकतंत्र की चारपाई से तुलना, चीफ जस्टिस ने दी डेमोक्रेसी की ‘स्वदेशी’ मिसाल

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्यायिक स्वतंत्रता और भारतीय लोकतंत्र की तुलना एक पारंपरिक चारपाई से की, जिसमें मजबूत फ्रेम, टिकाऊ पाये और लचीली रस्सियां कठोरता व लचीलापन दोनों प्रदान करती हैं। वे हरियाणा के ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन’ के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
केशवानंद भारती केस का ऐतिहासिक री-एनैक्टमेंट
सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के 13 न्यायाधीशों ने CJI सूर्यकांत की अगुआई में 1973 के केशवानंद भारती केस की ऐतिहासिक बहस का पुनर्जनन किया। यूनिवर्सिटी के अत्याधुनिक मूट कोर्ट में आयोजित इस सत्र ने संविधान के ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ सिद्धांत को स्थापित करने वाली बहस को जीवंत किया।
इसमें अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि और वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने भारत सरकार व केरल सरकार का पक्ष रखा, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व किया। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन मिश्रा, वरिष्ठ वकील, हाई कोर्ट जज, ब्राजील के मुख्य न्यायाधीश, नेपाल सुप्रीम कोर्ट के एक जज और एक ब्रिटिश सांसद विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
’23 साल के लोकतंत्र की परिपक्वता’
CJI सूर्यकांत ने कहा कि केशवानंद केस के समय भारत संवैधानिक रूप से मात्र 23 वर्ष का था, फिर भी 13 जजों की पीठ ने संवैधानिक परिपक्वता और नैतिकता का रास्ता चुना। उन्होंने संसद के बहुमत से संविधान के नैतिक DNA को बदलने से इनकार कर दिया, जिसने दिखाया कि लोकतंत्र को बुद्धिमान बनने के लिए लंबा समय नहीं चाहिए। उन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन में कार्यपालिका द्वारा न्यायिक स्वतंत्रता की सीमाओं को परखने की बहस का भी उल्लेख किया।
‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता नागरिक का अधिकार’
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि केशवानंद फैसला निर्णय लेने और संस्थागत स्वतंत्रता को रेखांकित करता है। संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को जजों का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि नागरिकों का अधिकार माना। उन्होंने जोर दिया कि जजों का आचरण, बेंच पर और बाहर, जनता के विश्वास के लिए संदेह से परे होना चाहिए।
‘न्याय का त्रिमूर्ति संतुलन’
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय का संतुलन देश की आर्थिक मजबूती के लिए आवश्यक है। यह त्रिमूर्ति संतुलित होने पर ही समग्र विकास संभव है।
सम्मेलन ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को वैश्विक और भारतीय संदर्भ में मजबूत करने के लिए तुलनात्मक दृष्टिकोण पर चर्चा को बढ़ावा दिया।



