बस्तर में बदली बयार: बंदूक की गूंज की जगह अब बच्चों की खिलखिलाहट, दुर्गकोंडल में सजी ‘बाल चौपाल’

कांकेर। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की तस्वीर अब तेजी से बदल रही है। जिस क्षेत्र में कभी नक्सलवाद का खौफ पसरा रहता था, वहां अब उम्मीदों की नई किरण दिखाई दे रही है। उत्तर बस्तर कांकेर के दुर्गकोंडल में आयोजित ‘बाल चौपाल’ इस बड़े सामाजिक बदलाव का प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर उभरी है। यह आयोजन शासन की उन कोशिशों का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य सुदूर और संवेदनशील क्षेत्रों के बच्चों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है।

जमीनी स्तर पर पहुंचा प्रशासन
छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा के कार्यकाल का एक वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित इस विशेष चौपाल में महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और हस्तशिल्प विकास बोर्ड की अध्यक्ष शालिनी राजपूत शामिल हुईं। इस दौरान जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने ग्रामीणों व बच्चों से सीधा संवाद किया। यह पहल स्पष्ट करती है कि सरकार अब केवल फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर पहुंचकर लोगों की समस्याओं का समाधान कर रही है।
सुरक्षा और अधिकारों के प्रति सजग हुए बच्चे
कार्यक्रम में बच्चों को उनके अधिकारों और आत्मरक्षा के प्रति जागरूक किया गया। विशेष रूप से ‘गुड टच-बैड टच’ जैसे संवेदनशील विषयों पर सरल भाषा में जानकारी दी गई। खेल-खेल में दी गई नैतिक शिक्षा के माध्यम से बच्चों को अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी के पाठ पढ़ाए गए। साथ ही चाइल्ड हेल्पलाइन के प्रभावी उपयोग की जानकारी दी गई, जिसे लेकर बच्चों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी।

डिजिटल कनेक्टिविटी की चुनौती और समाधान
संवाद के दौरान दूरस्थ क्षेत्रों में डिजिटल संसाधनों की कमी का मुद्दा भी सामने आया। डिजिटल शिक्षा से वंचित बच्चों की समस्या को देखते हुए अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि आगामी सत्र से जिला शिक्षा अधिकारी के माध्यम से समन्वय कर स्कूलों को आधुनिक संसाधनों से जोड़ा जाएगा। डॉ. वर्णिका शर्मा ने इस आयोजन को बदलते बस्तर की एक नई गाथा बताया, जहां अब भय का स्थान शिक्षा और खुशहाली ले रही है।

मुख्यधारा में लौटे परिवारों से संवाद
कार्यक्रम के पश्चात मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और आयोग की अध्यक्ष ने पुनर्वास केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने मुख्यधारा में वापस लौटे पूर्व नक्सलियों और उनके परिवारों से मुलाकात कर उनकी समस्याओं को सुना। शासन का उद्देश्य इन परिवारों को समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाना और उनके जीवन में स्थायित्व सुनिश्चित करना है। यह कदम बस्तर में शांति और विश्वास बहाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो रहा है।



