एसआईआर प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अपील सुनने के लिए ट्रिब्यूनल बनाने के निर्देश

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के खिलाफ ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के अन्य सांसदों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर एक नोटिफिकेशन जारी करे, जिसमें एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों को शामिल करते हुए अपीलेट ट्रिब्यूनल का गठन किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह ट्रिब्यूनल उन मामलों की अपीलों पर सुनवाई करेगा, जिन्हें न्यायिक अधिकारी खारिज कर रहे हैं। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि किसी आवेदन को न्यायिक अधिकारी अस्वीकार करते हैं तो उसके कारण भी स्पष्ट रूप से बताए जाएं। ट्रिब्यूनल के संचालन का पूरा खर्च चुनाव आयोग वहन करेगा।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कोर्ट को बताया कि न्यायिक अधिकारियों ने अब तक लगभग 7 लाख मामलों की प्रक्रिया पूरी कर ली है। कुल 63 लाख मामलों में से करीब 57 लाख मामलों का निपटारा अभी बाकी है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने जानकारी दी है कि अब तक 10 लाख से अधिक आपत्तियों का निपटारा किया जा चुका है। इस पर कोर्ट ने अग्रिम याचिका दाखिल करने पर नाराजगी जताते हुए कहा कि इससे गलत संदेश जाता है कि याचिकाकर्ताओं को व्यवस्था पर भरोसा नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाना उचित नहीं है और इस संबंध में सख्त चेतावनी दी गई है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो इस मामले में अवमानना का नोटिस भी जारी किया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भी नाराजगी जताते हुए कहा कि स्थिति ऐसी बन गई है कि अब दोनों पक्षों की सच्चाई पर संदेह होने लगा है।
सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया गया कि पश्चिम बंगाल से 500 से अधिक तथा ओडिशा और झारखंड से करीब 200 न्यायिक अधिकारियों को तैनात किया गया है, जो दिन-रात काम कर रहे हैं। कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि न्यायिक अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारियां निभाने के लिए सभी आवश्यक लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को भी निर्देश दिया कि तैनात अधिकारियों को सभी जरूरी सुविधाएं दी जाएं। चुनाव आयोग को यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया कि ऐसी कोई व्यवस्था लागू न की जाए जिससे कामकाज में बाधा आए। जरूरत पड़ने पर न्यायिक अधिकारियों के लिए नई लॉगिन आईडी तुरंत उपलब्ध कराई जाए।



