बंगाल में बकरीद पर कुर्बानी को लेकर घमासान: महुआ मोइत्रा पहुंचीं हाई कोर्ट, कोर्ट ने तत्काल राहत से किया इनकार

कोलकाता न्यूज़ (Kolkata High Court Bakrid Verdict): पश्चिम बंगाल में बकरीद (Eid-ul-Adha) से ठीक पहले जानवरों की कुर्बानी को लेकर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। आगामी 27 या 28 मई को मनाए जाने वाले इस त्योहार के मद्देनजर, टीएमसी (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा और विधायक अखरुज्जमान ने कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में पशु वध अधिनियम के तहत विशेष छूट की मांग की गई थी। गुरुवार 21 मई को इस मामले पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को कोई भी अंतरिम राहत देने से साफ मना कर दिया है।

महुआ मोइत्रा की दलील: ‘यह सिर्फ एक समुदाय का नहीं, व्यापार का भी मामला’
कोर्ट के बाहर मीडिया से बात करते हुए टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि यह मामला सिर्फ एक समुदाय की धार्मिक आस्था से नहीं जुड़ा है। इसके पीछे एक बड़ा आर्थिक पहलू भी है। उन्होंने दलील दी कि कई हिंदू व्यापारी भी बकरीद के मौके पर जानवर बेचकर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट में कहा कि वे केवल भैंस या बैल की कुर्बानी की इजाजत मांग रहे हैं, गाय की नहीं। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने गाय की कुर्बानी पर रोक लगाई है, लेकिन भैंस और बैल पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है।
कलकत्ता हाई कोर्ट की 3 बड़ी और सख्त बातें
चीफ जस्टिस सुजॉय पाल और जस्टिस पार्था सारथी सेन की डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान तीन बेहद अहम बातें कहीं:
- सार्वजनिक स्थानों पर रोक: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, किसी भी खुली या सार्वजनिक जगह पर गाय, भैंस या किसी भी जानवर को काटना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
- इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं: अदालत ने 1975 के ऐतिहासिक ‘मोहम्मद हनीफ कुरैशी बनाम बिहार सरकार’ मामले का हवाला दिया। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी देना इस्लाम का कोई अनिवार्य हिस्सा नहीं है।
- सरकार तय करे: हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह 24 घंटे के भीतर यह तय करे कि क्या पशु वध अधिनियम 1950 की धारा 12 के तहत इस मामले में कोई छूट दी जा सकती है या नहीं।
76 साल पुराना कानून, तुरंत राहत नहीं
अदालत ने साफ कहा कि पशु वध अधिनियम 1950 एक 76 साल पुराना स्थापित कानून है। जब तक इस कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं कर दिया जाता, तब तक इसकी कानूनी वैधता बनी रहेगी। यही वजह है कि कोर्ट ने त्योहार के लिए कोई भी तुंरत राहत देने से इनकार कर दिया है।


