3.5 करोड़ लोगों की पहचान पर संकट: क्या दिल्ली छीनेगी छत्तीसगढ़िया हक?

छत्तीसगढ़ की अस्मिता और मातृभाषा के सम्मान को लेकर जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्टी ने रायपुर कलेक्टर के माध्यम से भारत सरकार को चेतावनी दी है कि आगामी जनगणना 2026-27 के पोर्टल में छत्तीसगढ़ी भाषा का विकल्प हर हाल में शामिल किया जाए। साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा लोगों की भावनाओं का हवाला देते हुए ज्ञापन में साफ कहा गया है कि यदि जनगणना फॉर्म में मातृभाषा के कॉलम में छत्तीसगढ़ी को जगह नहीं मिली, तो यह राज्य की साख और आंकड़ों के साथ बड़ा खिलवाड़ होगा। राज्य की इस राजभाषा का इतिहास हिंदी से भी पुराना है जिसका व्याकरण 1885 में ही लिखा जा चुका था लेकिन आज भी इसे सरकारी सिस्टम में अपनी सही जगह के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
65 फीसदी जनता की जुबान पर सिस्टम की खामोशी
सरकारी सर्वेक्षणों की रिपोर्ट चौंकाने वाली है क्योंकि छत्तीसगढ़ में 65 प्रतिशत से अधिक आबादी छत्तीसगढ़ी बोलती है जबकि हिंदी बोलने वालों का आंकड़ा महज 2 प्रतिशत के करीब है। इसके बावजूद जनगणना जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्य में छत्तीसगढ़ की आधिकारिक भाषा की अनदेखी की जा रही है जो भाषाई आधार पर बने इस राज्य के मूल सिद्धांतों का अपमान है। जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी ने मांग की है कि छत्तीसगढ़ी को तत्काल संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए और इसे प्राथमिक शिक्षा के साथ समस्त शासकीय कार्यों की अनिवार्य भाषा बनाया जाए। जब सिंधी, नेपाली और मणिपुरी जैसी कम बोलने वाली भाषाएं सूची में शामिल हो सकती हैं तो करोड़ों की आबादी वाली छत्तीसगढ़ी के साथ यह सौतेला व्यवहार अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।




