रायपुर में ‘आकार-2026’ का भव्य समापन, 1281 बच्चों ने सीखीं पारंपरिक कलाएं और डिजिटल आर्ट की बारीकियां

रायपुर। राजधानी के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में पिछले 16 दिनों से चल रहा बहुप्रतीक्षित कला प्रशिक्षण शिविर ‘आकार-2026’ मंगलवार को रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ संपन्न हो गया। संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित इस विशेष समर कैंप (Summer Camp) में इस साल पूरे छत्तीसगढ़ से आए 1281 बच्चों और युवाओं ने हिस्सा लिया। समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल शामिल हुए। कार्यक्रम में पारंपरिक लोक नृत्य और गीतों की ऐसी धूम रही कि वहां मौजूद हर कोई मंत्रमुग्ध हो गया।

मिट्टी और अपनी संस्कृति से जुड़ना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत: बृजमोहन अग्रवाल
समारोह को संबोधित करते हुए सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने पुरानी यादें ताजा कीं। उन्होंने बताया कि साल 2004 में जब वे संस्कृति मंत्री थे, तब उन्होंने ही इस ‘आकार’ शिविर की शुरुआत की थी। उन्होंने कहा कि आज की नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, कला और लोक परंपराओं (Folk Traditions) की जानकारी देना समय की मांग है। बच्चे जिस दिन मिट्टी से जुड़कर कुछ नया बनाना सीख जाएंगे, उनका जीवन संवेदनशीलता से भर जाएगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि ऐसे आयोजन छत्तीसगढ़ के सभी संभागों में होने चाहिए और स्थानीय कलाकारों की आर्थिक मदद के लिए पारंपरिक आभूषणों और हस्तशिल्प (Handicrafts) का एक परमानेंट बिक्री केंद्र बनना चाहिए।]

गोदना और भित्ति चित्र के साथ सीखी एआई आर्ट की नई तकनीक
संस्कृति विभाग के संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने बताया कि युवाओं की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी तय करने के लिए इस बार रजिस्ट्रेशन फीस को 200 रुपये से घटाकर सिर्फ 100 रुपये किया गया था। साथ ही अनाथ और दिव्यांग बच्चों को मुफ्त एंट्री दी गई। इस 16 दिवसीय शिविर (Art Training Camp) की सबसे खास बात यह रही कि यहां बच्चों को रजवार भित्ति चित्र, टेराकोटा, जूट शिल्प, गोदना और मांडना जैसी पारंपरिक कलाओं के साथ-साथ मॉडर्न टेक्नोलॉजी से जोड़ते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence Based Art) आधारित कला का भी प्रशिक्षण दिया गया।

सांस्कृतिक शाम में सुवा, कर्मा और पंथी नृत्य की दिखी अद्भुत झलक
शिविर के आखिरी दिन आयोजित सांस्कृतिक संध्या में ट्रेडिशनल वेशभूषा पहने कलाकारों ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति के रंग बिखेरे। बच्चों ने मंच पर जब सुवा नृत्य, कर्मा, पंथी, बांसगीत और भरथरी गायन की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं, तो पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि ने शिविर में बच्चों को हुनर सिखाने वाले सभी कला गुरुओं और ट्रेनर्स को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। इस सफल आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत नई पीढ़ी के हाथों में पूरी तरह सुरक्षित है।



