अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी: छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी ने मुख्य सचिव को लिखा 16 पन्नों का पत्र, नियमित भर्ती की उठाई मांग

रायपुर।
छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में डॉक्टरों सहित प्रोफेसरों के खाली पड़े पदों को लेकर छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी ने मोर्चा खोल दिया है। सोसायटी ने राज्य के मुख्य सचिव को 16 पन्नों का एक लंबा मांग पत्र भेजा है। इस पत्र में साफ कहा गया है कि डॉक्टरों की भारी कमी के कारण राज्य की स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुकी हैं। करोड़ों मरीजों का बोझ उठाने वाले बड़े सरकारी अस्पताल स्टाफ की किल्लत से बुरी तरह हांफ रहे हैं।
सीनियर रेजिडेंट और प्रोफेसरों के आधे से ज्यादा पद खाली
सोसायटी द्वारा जारी किए गए सरकारी आंकड़ों का गणित बेहद डरावना है। अस्पतालों में चौबीस घंटे मुस्तैद रहने वाले सीनियर रेजिडेंट (SR) के कुल 518 पदों में से 375 पद खाली पड़े हैं। यानी करीब 72 प्रतिशत से ज्यादा पदों पर डॉक्टरों की तैनाती ही नहीं हुई है। इसी तरह मेडिकल छात्रों को पढ़ाने वाले प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के भी लगभग 50 फीसदी पद सूने हैं। इसके अलावा, पूरे प्रदेश में चिकित्सा विशेषज्ञों के 80 प्रतिशत पद खाली हैं। हालात इतने बुरे हैं कि नवगठित मोहला-मानपुर और सुकमा जैसे संवेदनशील और आदिवासी इलाकों में विशेषज्ञों की संख्या बिल्कुल शून्य है।
अजीब विरोधाभास: 17 हजार डॉक्टर उपलब्ध, फिर भी नियुक्तियां बंद
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल में कुल 17,142 डॉक्टर पंजीकृत (registered) हैं। इनमें विशेषज्ञ और सर्जन भी शामिल हैं। इतने बड़े डॉक्टरों के पूल (pool) के बावजूद साल 2020 के बाद से छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग यानी सीजीपीएससी (CGPSC) के माध्यम से कोई नियमित भर्ती प्रक्रिया आयोजित नहीं की गई है। योग्य डॉक्टर बेरोजगार घूम रहे हैं या निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं, जबकि सरकारी अस्पताल खाली पड़े हैं। इसी का नतीजा है कि राज्य का 85 प्रतिशत हेल्थकेयर आज निजी क्षेत्र के भरोसे चल रहा है।
कांकेर और राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज बदहाली के शिकार
पत्र में जमीनी हकीकत बताने के लिए दो बड़े कॉलेजों का उदाहरण दिया गया है। कांकेर मेडिकल कॉलेज का ढांचा 5 से 6 किलोमीटर की दूरी पर तीन अलग-अलग इमारतों में बिखरा हुआ है। वहां ईएनटी और त्वचा रोग जैसे विभागों में एक भी डॉक्टर नहीं है। वहीं, राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज में फिजियोलॉजी और रेडियोलॉजी जैसे महत्वपूर्ण विभागों में कोई विभागाध्यक्ष यानी एचओडी (HOD) ही नहीं है। अस्पताल का पूरा एक्स-रे और जांच विभाग केवल एक अस्थायी कर्मचारी के भरोसे घिसट रहा है।
सोसायटी ने सरकार के सामने रखे ये बड़े सुधारात्मक सुझाव
- सीजीपीएससी के माध्यम से सभी खाली पदों पर तुरंत पारदर्शी नियमित भर्ती (regular recruitment) शुरू की जाए।
- पीजी पास करने वाले सभी डॉक्टरों को अनिवार्य रूप से मेडिकल कॉलेजों में सीनियर रेजिडेंट बनाया जाए।
- ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देने वाले डॉक्टरों को सरकारी नौकरियों में एक्स्ट्रा बोनस अंक दिए जाएं।
- इंटर्न डॉक्टरों का मानदेय सम्मानजनक किया जाए ताकि डॉक्टरों का दूसरे राज्यों में पलायन रोका जा सके।
- अव्यावहारिक और दमनकारी बांड नीति (bond policy) में सुधार किया जाए, जिसके डर से डॉक्टर 25 लाख रुपये देकर राज्य छोड़ रहे हैं।
- अगले 12 महीनों के भीतर रायपुर समेत कम से कम दो बड़े सरकारी अस्पतालों में किडनी, लीवर और हार्ट ट्रांसप्लांट की सुविधा शुरू हो।



