हाईकोर्ट ने बिना सबूत चरित्र पर आरोप लगाने को माना मानसिक क्रूरता, डॉक्टर पति को तलाक, पत्नी को 25 लाख गुजारा भत्ता

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने तलाक के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पक्के सबूत के अभाव में जीवनसाथी पर अवैध संबंधों (अफेयर) के गंभीर आरोप लगाना मानसिक क्रूरता का सबसे गंभीर रूप है। कोर्ट ने पत्नी द्वारा पति पर लगाए गए बेबुनियाद आरोपों को आधारहीन करार देते हुए पति की तलाक याचिका स्वीकार कर ली तथा पत्नी को 25 लाख रुपये का एकमुश्त गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।
यह मामला सारंगढ़ निवासी एक डॉक्टर का है, जिनका विवाह वर्ष 2008 में भिलाई की एक महिला डॉक्टर से हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद दोनों के बीच संबंधों में तनाव आ गया। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करती थी, मांग में सिंदूर तथा मंगलसूत्र पहनने से इनकार करती थी तथा उस पर लगातार चरित्रहीन होने के झूठे आरोप लगाती थी।
पति ने पहले दुर्ग जिला परिवार न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया था। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान सामने आया कि पत्नी ने लिखित बयान में पति का एक अन्य महिला डॉक्टर से संबंध होने का गंभीर आरोप लगाया था, लेकिन वह इस आरोप को किसी भी प्रमाण के साथ साबित नहीं कर पाई।
न्यायमूर्ति रजनी दुबे तथा न्यायमूर्ति ए.के. प्रसाद की डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षित पत्नी द्वारा पति पर बिना किसी ठोस आधार के अवैध संबंधों का आरोप लगाना क्रूरता का अत्यंत घृणित रूप है। कोर्ट ने पाया कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों को साबित करने में विफल रहने से पति को गंभीर मानसिक कष्ट हुआ।
हालांकि कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अप्रैल 2019 में दोनों ने साथ में फिल्म देखी थी, इसलिए केवल अलग रहने के आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता। लेकिन मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक को उचित ठहराया गया।
तलाक की डिक्री मंजूर करते हुए अदालत ने पति को आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी को 25 लाख रुपये का एकमुश्त गुजारा भत्ता प्रदान करे। यह राशि छह माह के भीतर दी जाए। कोर्ट ने ध्यान में रखा कि दोनों ही पेशे से डॉक्टर हैं तथा आर्थिक रूप से सक्षम हैं, फिर भी बेटी की परवरिश तथा भविष्य से जुड़ी कानूनी जटिलताओं से बचने के लिए यह व्यवस्था की गई है।



