निजता के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं, डेटा शेयरिंग के नाम पर व्हाट्सएप और मेटा को सुप्रीम कोर्ट की कड़ी चेतावनी

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सएप और मेटा की विवादित प्राइवेसी पॉलिसी पर सुनवाई करते हुए बेहद तल्ख टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि डेटा शेयरिंग के नाम पर देश के नागरिकों की निजता के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। यह मामला व्हाट्सएप की उस पॉलिसी से जुड़ा है जिसमें यूजर्स को अनिवार्य रूप से शर्तें माननी पड़ती हैं या ऐप छोड़ना पड़ता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने कहा कि प्राइवेसी की शर्तें इतनी जटिल भाषा में लिखी जाती हैं कि एक साधारण व्यक्ति उन्हें समझ ही नहीं पाता। कोर्ट ने व्हाट्सएप से पूछा कि यूजर्स को डेटा शेयरिंग से बाहर निकलने यानी ऑप्ट-आउट का विकल्प क्यों नहीं दिया जा रहा है। पीठ ने इसे निजी जानकारी की चोरी करने का एक सभ्य तरीका करार दिया और कहा कि कंपनियां नागरिकों की मजबूरी का फायदा उठा रही हैं।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि देश में निजता का अधिकार संवैधानिक रूप से संरक्षित है और कंपनियां इसका मजाक नहीं उड़ा सकतीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए सवाल किया कि सड़क पर सब्जी बेचने वाली महिला या घरेलू सहायिका इन पेचीदा शर्तों को कैसे समझेंगी। कोर्ट ने व्हाट्सएप की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि एकाधिकार स्थापित कर लोगों के डेटा का इस तरह इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
यह पूरा विवाद भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) द्वारा नवंबर 2024 में लगाए गए 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने से शुरू हुआ था। सीसीआई ने पाया था कि व्हाट्सएप ने यूजर्स पर अपनी शर्तें थोपी हैं, जो प्रतिस्पर्धा अधिनियम का उल्लंघन है। हालांकि बाद में एनसीएलएटी ने विज्ञापन संबंधी डेटा साझाकरण पर लगे कुछ प्रतिबंधों को हटा दिया था, लेकिन जुर्माने को बरकरार रखा था। अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले की गहराई से समीक्षा कर रहा है।
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