FCI की मनमानी कटौती पर हाईकोर्ट का शिकंजा, राइस मिल के पक्ष में ₹2.46 लाख की डिक्री बरकरार

बिलासपुर। हाईकोर्ट ने फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) द्वारा व्यावसायिक कर और अन्य शुल्क के नाम पर की गई कटौती को गलत ठहराते हुए राइस मिल के पक्ष में पारित वसूली की डिक्री को बरकरार रखा है. कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा निर्धारित 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज को घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया. जस्टिस सुषमा सावंत की सिंगल बेंच ने एफसीआई की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर यह आदेश जारी किया.
रायपुर के द्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश द्वारा 29 अप्रैल 2009 को पारित निर्णय के खिलाफ याचिका दायर हुई थी. मामले में एफसीआई अपीलार्थी और रायपुर के गंजपारा स्थित मेसर्स सूरज बेसन एंड राइस मिल प्रतिवादी थी. एफसीआई की ओर से अधिवक्ता बीपी गुप्ता और राइस मिल की ओर से अधिवक्ता बीपी शर्मा और मितिशा कोटेचा ने पैरवी की. एफसीआई ने अगस्त 1998 में रायपुर के विभिन्न डिपो में खराब अनाज की बिक्री के लिए टेंडर जारी किया था. राइस मिल ने 1,280.41 मीट्रिक टन खाद्यान्न के लिए टेंडर दिया. 11 नवंबर 1998 को एफसीआई ने 11,415 क्विंटल खराब अनाज के लिए उसका टेंडर स्वीकार किया, जिसकी कीमत 65 लाख 38 हजार 110 रुपये थी. राइस मिल ने भुगतान के लिए किस्तों की अनुमति मांगी और व्यावसायिक कर हटाने का आग्रह किया. बाद में 7 जनवरी 1999 को 25 लाख, 8 जनवरी को 30 लाख और 14 जनवरी को 10 लाख 38 हजार 110 रुपये जमा किए गए.
राइस मिल का कहना था कि एफसीआई ने जारी किए गए बिलों में व्यावसायिक कर समेत अन्य राशि की कटौती कर ली. अंतिम हिसाब में एफसीआई ने 11,414 क्विंटल 18 किलो माल के बदले 10,944 क्विंटल 2 किलो माल दिया. अंतर की राशि के रूप में 4, 54, 741 रुपये का बिल प्रस्तुत किया गया, लेकिन एफसीआई ने राशि का भुगतान नहीं किया. इसके बाद बकाया राशि और ब्याज की वसूली के लिए राइस मिल ने सिविल वाद दायर किया. निचली अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर वाद आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 2,46,960 रुपये की डिक्री 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ पारित की थी. हाईकोर्ट में एफसीआई ने तर्क दिया कि, टेंडर की शर्तों के अनुसार विलंब से भुगतान पर दंडात्मक ब्याज और निर्धारित अवधि में माल नहीं उठाने पर स्टोरेज शुल्क लेना उचित था. एफसीआई ने यह भी कहा कि निचली अदालत द्वारा 12 प्रतिशत ब्याज देना अत्यधिक है, दूसरी ओर राइस मिल ने निचली अदालत के निर्णय का समर्थन करते हुए कहा कि, एफसीआई द्वारा की गई कटौतियां टेंडर की शर्तों के अनुरूप नहीं थीं.
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और साक्ष्यों की समीक्षा में पाया कि एफसीआई की गवाह लेखा चटर्जी ने जिरह में स्वीकार किया था कि स्वीकृत टेंडर में व्यावसायिक कर की कटौती का कोई प्रावधान नहीं था, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राइस मिल के बिलों से काटी गई व्यावसायिक कर की राशि संबंधित वाणिज्यिक कर विभाग में जमा नहीं की गई. जस्टिस सुषमा सावंत ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 34 के तहत सामान्यतः 6 प्रतिशत ब्याज उचित है और राइस मिल ने ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जिससे अधिक ब्याज दिए जाने का आधार बनता हो. हाईकोर्ट ने मूल 2,46,960 रुपये की डिक्री बरकरार रखते हुए निर्देश दिया कि, इस राशि पर वाद दायर करने की तारीख 27 मार्च 2002 से वास्तविक भुगतान तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दिया जाए.



