39 साल बाद आया फैसला: न्याय में देरी ने बुजुर्ग की पूरी जिंदगी निगल ली

भगवानू नायक बोले – “Justice delayed is justice denied”, न्यायिक प्रक्रियाओं को तेज और सरल बनाने की आवश्यकता
रायपुर। छत्तीसगढ़ के रायपुर से न्यायपालिका पर सवाल उठाने वाला चौंकाने वाला मामला सामने आया है। 83 वर्षीय जागेश्वर अवधिया को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 39 साल बाद 100 रुपए की रिश्वत के मामले में दोषमुक्त कर दिया। यह मामला 1986 में मध्यप्रदेश स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन से जुड़ा था, जिसे लोकायुक्त ने दर्ज किया था।
इस फैसले के बाद सामाजिक न्याय कार्यकर्ता और अधिवक्ता भगवानू नायक ने कहा कि यह घटना हमारी न्याय व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। उन्होंने कहा –
“Justice delayed is justice denied” यानी, देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है। जागेश्वर अवधिया का मामला इस कहावत का जीता-जागता उदाहरण है।”
न्यायिक प्रक्रियाओं पर सवाल…
भगवानू नायक ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करता है, और सुप्रीम कोर्ट ने इसे त्वरित न्याय से भी जोड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या 39 साल का इंतजार “त्वरित” की परिभाषा में आता है?
उन्होंने जोड़ा कि इस देरी ने न सिर्फ एक इंसान की जवानी और बुढ़ापा छीन लिया, बल्कि उसके मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन को भी नष्ट कर दिया।
सुधार की ज़रूरत…
भगवानू नायक ने कहा कि यह घटना केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि न्यायिक तंत्र का आईना है। लाखों मामले अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि –
- न्यायिक प्रक्रियाओं को सरल, तेज और डिजिटल बनाना होगा।
- छोटे मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स का विस्तार होना चाहिए।
- जिन मामलों में अंततः आरोपी बरी हो जाता है, वहाँ जांच एजेंसियों और अभियोजन की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
- सबसे महत्वपूर्ण, जब तक दोष सिद्ध न हो, तब तक आरोपी को निर्दोष मानने की उपधारणा केवल कानून में नहीं, बल्कि समाज के व्यवहार में भी लागू होनी चाहिए।



