पार्श्व गायन की रानी: नया दौर से मिली बड़ी पहचान, सदाबहार गानों से आशा भोसले ने बनाया विश्व रिकॉर्ड

नई दिल्ली। भारतीय संगीत जगत की दिग्गज पार्श्व गायिका आशा भोसले का निधन हो गया है। उन्होंने 92 वर्ष की आयु में मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली। चिकित्सकों के अनुसार, उनके निधन का मुख्य कारण मल्टीपल ऑर्गन फेलियर रहा। उनके जाने से देश और दुनिया में फैले करोड़ों प्रशंसकों और फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
संगीत इतिहास में दर्ज है रिकॉर्ड
8 सितंबर 1933 को जन्मी आशा भोसले ने सात दशकों से अधिक लंबे करियर में करीब 800 से अधिक फिल्मों के लिए 12,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए। उनके इसी बेमिसाल योगदान को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने भी मान्यता दी है। संगीत के प्रति उनकी सेवा के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्म विभूषण और सिनेमा के सबसे बड़े पुरस्कार दादासाहेब फाल्के से सम्मानित किया था।
पिता से मिली संगीत की विरासत
मंगेशकर परिवार में जन्मीं आशा ने संगीत की शुरुआती शिक्षा अपने पिता दीनानाथ मंगेशकर से प्राप्त की थी। अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ उन्होंने बहुत कम उम्र में ही गायन शुरू कर दिया था। साल 1948 में फिल्म चुनरिया से अपने सफर की शुरुआत करने वाली आशा ने अपनी मेहनत के दम पर शीर्ष मुकाम हासिल किया। उन्होंने शास्त्रीय संगीत, गजल और भजन से लेकर पॉप और वेस्टर्न स्टाइल के गानों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
सफलता का सफर और यादगार जोड़ी
आशा भोसले को 1957 में फिल्म नया दौर और तुमसा नहीं देखा से बड़ा ब्रेक मिला। संगीतकार ओ.पी. नैयर के साथ उनकी जोड़ी ने कई सुपरहिट गाने दिए। इसके बाद उन्होंने संगीत निर्देशक आर.डी. बर्मन के साथ मिलकर संगीत का नया जादू बिखेरा। दम मारो दम, पिया तू अब तो आजा और चुरा लिया है तुमने जैसे गानों ने उन्हें पार्श्व गायन की रानी बना दिया। उन्होंने अपनी आवाज से पर्दे पर हर अभिनेत्री के किरदार में जान फूंक दी।
व्यवसाय और व्यक्तिगत जीवन
संगीत के अलावा आशा जी को खाना पकाने का बेहद शौक था। एक सफल उद्यमी के तौर पर उन्होंने आशाज नाम से अंतरराष्ट्रीय रेस्टोरेंट चेन की स्थापना की, जिसके आउटलेट दुबई, कुवैत और यूके जैसे देशों में हैं। निजी जीवन के उतार-चढ़ाव और संघर्षों के बावजूद वे अंत तक सक्रिय रहीं और रियलिटी शो में जज के रूप में नई प्रतिभाओं का मार्गदर्शन करती रहीं। उनके निधन को भारतीय कला और संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।



