बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर सरकार का फोकस, छात्रावासों के लिए आयोग ने तैयार की व्यापक SOP

रायपुर। छत्तीसगढ़ के आश्रम-छात्रावासों और आवासीय विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और बाल अधिकारों के संरक्षण को लेकर राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने व्यापक कार्ययोजना तैयार की है। आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने बुधवार को आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास मंत्री रामविचार नेताम से मुलाकात कर बाल सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं में सुधार के लिए विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) प्रस्तावित की। मंत्री नेताम ने आयोग के सुझावों पर शीघ्र और ठोस कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
बैठक में प्री-मैट्रिक, पोस्ट-मैट्रिक, एकलव्य, प्रयास और कन्या शिक्षा परिसरों सहित सभी आवासीय संस्थानों में बच्चों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और बाल अधिकारों से संबंधित कानूनों के प्रभावी पालन पर चर्चा हुई। इसमें POCSO एक्ट 2012 और किशोर न्याय अधिनियम 2015 के प्रावधानों के अनुपालन को प्राथमिकता दी गई।
आयोग की प्रस्तावित SOP में बच्चों की आकस्मिक मृत्यु रोकने के लिए प्रत्येक छात्रावास को नजदीकी 24 घंटे संचालित स्वास्थ्य केंद्र और 108 संजीवनी एक्सप्रेस से जोड़ने का सुझाव दिया गया है। मलेरिया, डायरिया, पीलिया, सिकलसेल और सर्पदंश जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने के लिए बुखार आने पर 2 से 6 घंटे के भीतर रक्त जांच और अस्पताल रेफरल की व्यवस्था अनिवार्य करने का प्रस्ताव है।
छात्रावासों की जवाबदेही तय करने के लिए अधीक्षकों का परिसर में ही रात्रि निवास अनिवार्य करने की सिफारिश की गई है। साथ ही रात 9 से 9:30 बजे तक जियो-फेंसिंग आधारित फेस अटेंडेंस लागू करने और एक व्यक्ति को केवल एक ही छात्रावास का प्रभार देने का सुझाव दिया गया है। रसोइए या चौकीदार के भरोसे छात्रावास संचालन और अधीक्षकों के मुख्यालय से बाहर रहने की व्यवस्था पर रोक लगाने की बात भी कही गई है।
कन्या छात्रावासों की सुरक्षा को लेकर आयोग ने केवल महिला अधीक्षक, महिला रसोइया और महिला सुरक्षा गार्ड की तैनाती का प्रस्ताव रखा है। छात्रावासों में पुरुषों के प्रवेश पर प्रतिबंध के साथ सभी प्रवेश द्वारों पर नाइट विजन सीसीटीवी कैमरे लगाने, 30 दिन का बैकअप रखने, बाल सुरक्षा नीति लागू करने और शिकायत पेटी स्थापित करने की सिफारिश की गई है।
इसके अलावा मानसून से पहले छात्रावास भवनों का स्ट्रक्चरल और इलेक्ट्रिकल सेफ्टी ऑडिट, बाउंड्रीवॉल निर्माण और खिड़कियों में मच्छरदानी वाली जाली लगाने का सुझाव दिया गया है। बच्चों में तनाव, आत्महत्या की प्रवृत्ति और ड्रॉपआउट रोकने के लिए नए विद्यार्थियों के लिए 15 दिवसीय ओरिएंटेशन कार्यक्रम, ‘संगवारी बडी सिस्टम’ और क्लस्टर स्तर पर मनोवैज्ञानिक काउंसलर नियुक्त करने की बात भी शामिल है।
बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण को बेहतर बनाने के लिए प्रत्येक विद्यार्थी का ABHA ID से जुड़ा डिजिटल हेल्थ कार्ड बनाने, सिकलसेल पॉजिटिव बच्चों को रेड कार्ड श्रेणी में रखकर नियमित दवा उपलब्ध कराने तथा भोजन भत्ते में महंगाई के अनुरूप वृद्धि का प्रस्ताव दिया गया है। भोजन में रागी, कोदो-कुटकी जैसे स्थानीय पौष्टिक अनाज, अंडा, दूध, हरी सब्जियां और गुड़-चना शामिल करने की सिफारिश की गई है।
वहीं, कन्या छात्रावासों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन, इंसिनरेटर और साप्ताहिक आयरन-फोलिक एसिड की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है। आयोग का मानना है कि इन व्यवस्थाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से प्रदेश के आश्रम-छात्रावासों को बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित, स्वस्थ और जवाबदेह बनाया जा सकेगा।



