बिना नोटिस नौकरी से निकालने पर हाईकोर्ट सख्त, रोजगार सहायक के पक्ष में सुनाया बड़ा फैसला

बिलासपुर
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट से संविदा कर्मचारियों के हक में एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। अदालत ने बिना कारण बताओ नोटिस और बिना सुनवाई का मौका दिए एक ग्राम रोजगार सहायक को नौकरी से हटाने के सरकारी आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए साफ कहा कि यह कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों यानी बिना किसी का पक्ष सुने सजा देने के नियम के खिलाफ है। अदालत ने पीड़ित कर्मचारी को पिछले पूरे वेतन के साथ अन्य आर्थिक लाभ देने के भी निर्देश जारी किए हैं।
जानें क्या था पूरा मामला और क्यों गई थी नौकरी
यह पूरा मामला बिलासपुर जिले के तखतपुर जनपद पंचायत के तहत आने वाले ग्राम पंचायत जरौंधा का है। यहां नीता बाई डाहीरे ग्राम रोजगार सहायक के पद पर तैनात थीं। उन पर काम में लापरवाही बरतने और कथित तौर पर फर्जी मस्टर रोल यानी मजदूरों की हाजिरी वाले सरकारी रजिस्टर में गड़बड़ी करने के आरोप लगे थे। इन आरोपों के आधार पर उन्हें अचानक नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। इस कार्रवाई के खिलाफ पीड़ित महिला ने बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
नोटिस दिए बिना हटाना कानूनन गलत, कोर्ट ने माना कलंककारी
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील श्रीकांत कौशिक ने अदालत को बताया कि विभाग ने इतनी बड़ी कार्रवाई करने से पहले नीता बाई को न तो कोई नोटिस दिया और न ही अपनी सफाई पेश करने का कोई मौका दिया। हैरानी की बात तो यह है कि नौकरी से निकालने के करीब तीन महीने बीत जाने के बाद विभाग ने उन्हें औपचारिकता पूरी करने के लिए नोटिस भेजा। हालांकि सरकारी वकीलों ने इस कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट ने इसे कानूनन गलत पाया। अदालत ने कहा कि जब किसी पर गंभीर आरोप लगाकर नौकरी से हटाया जाता है, तो उसे अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। बिना जांच और बिना सुनवाई के ऐसा आदेश देना कर्मचारी के भविष्य पर दाग लगाने जैसा है।
45 दिनों के भीतर बकाया वेतन देने का आदेश
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में साफ कहा कि नियमों की अनदेखी करके की गई ऐसी कोई भी कार्रवाई कानून की नजर में मान्य नहीं हो सकती। कोर्ट ने रोजगार सहायक को नौकरी से हटाने के पुराने आदेश को तुरंत निरस्त कर दिया। इसके साथ ही संबंधित अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ता को उनकी सेवा समाप्ति की अवधि का पूरा रुका हुआ वेतन और अन्य सभी आर्थिक लाभ 45 दिनों के भीतर दिए जाएं। हालांकि कोर्ट ने जनपद पंचायत को यह छूट भी दी है कि वे चाहें तो कानून के दायरे में रहकर इस मामले की नए सिरे से सही तरीके से जांच कर सकते हैं। संविदा पर काम करने वाले कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए इस फैसले को एक बड़ी नजीर माना जा रहा है।



