दशक का सबसे बड़ा सौर विस्फोट: रेडियो और जीपीएस सिस्टम हो सकते हैं बाधित, इसरो रख रहा पैनी नजर

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने सूर्य से निकले शक्तिशाली सोलर फ्लेयर्स को लेकर चेतावनी जारी की है। फरवरी 2026 की शुरुआत में सूर्य पर तेज गतिविधि दर्ज की गई, जिसमें 1 फरवरी को X8.1 श्रेणी का सोलर फ्लेयर सामने आया। इसे इस साल का सबसे शक्तिशाली फ्लेयर बताया जा रहा है और यह हाल के दशकों के सबसे मजबूत फ्लेयर्स में शामिल माना जा रहा है।
इसरो के अनुसार, ऐसे सोलर फ्लेयर्स के कारण रेडियो ब्लैकआउट, जीपीएस और नेविगेशन सिस्टम में रुकावट की आशंका रहती है। इसका असर भारतीय सैटेलाइट्स और संचार प्रणालियों पर भी पड़ सकता है।
सोलर फ्लेयर सूर्य की सतह पर अचानक होने वाला ऊर्जा का तीव्र विस्फोट होता है। यह सूर्य पर मौजूद सनस्पॉट्स में चुंबकीय क्षेत्र के टूटने से उत्पन्न होता है। इसके चलते एक्स-रे, अल्ट्रावायोलेट और रेडियो तरंगें प्रकाश की गति से अंतरिक्ष में फैलती हैं। ऐसे विस्फोट सोलर मैक्सिमम के दौरान अधिक होते हैं और फिलहाल सोलर साइकिल 25 के तहत सूर्य अत्यधिक सक्रिय है।
1 और 2 फरवरी 2026 को सूर्य से कई X-क्लास सोलर फ्लेयर्स निकले, जिनमें 1 फरवरी का X8.1 फ्लेयर सबसे तीव्र रहा। 3 और 4 फरवरी तक भी सौर गतिविधि बनी रही। वैज्ञानिकों के मुताबिक, सनस्पॉट AR14366 अब भी सक्रिय है और ऊर्जा छोड़ रहा है, जिससे आने वाले दिनों में और फ्लेयर्स की संभावना बनी हुई है।
वैज्ञानिक यह सटीक रूप से नहीं बता सकते कि अगला फ्लेयर कब आएगा, क्योंकि सूर्य की गतिविधि स्वभाव से अप्रत्याशित होती है। हालांकि, इसरो और नासा लगातार सूर्य की निगरानी कर स्पेस वेदर से जुड़ी चेतावनियां जारी कर रहे हैं।
इसरो के अनुसार, इन सोलर फ्लेयर्स का असर मुख्य रूप से उच्च फ्रीक्वेंसी रेडियो संचार पर पड़ सकता है। जीपीएस और नेविगेशन सिस्टम की सटीकता में कमी आ सकती है, जिससे विमानन, समुद्री यातायात और मछली पकड़ने वाली नौकाओं पर असर संभव है। इसरो अपने 50 से अधिक सैटेलाइट्स पर लगातार नजर रखे हुए है। पहले भी ऐसे मामलों में सैटेलाइट्स की कक्षा में हल्की गिरावट देखी गई है, लेकिन किसी बड़े नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है। पावर ग्रिड और रोजमर्रा के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर किसी खतरे की आशंका नहीं जताई गई है।
इसरो ने बताया कि उसके पास आपात स्थिति से निपटने की पूरी तैयारी है। यदि कोरोनल मास इजेक्शन पृथ्वी की ओर बढ़ता है, तो जियोमैग्नेटिक तूफान आ सकता है। ऐसी स्थिति में ध्रुवीय क्षेत्रों में औरोरा या नॉर्दर्न लाइट्स दिखाई दे सकती हैं।
इस निगरानी में इसरो के आदित्य एल-1 मिशन की अहम भूमिका है। यह मिशन सूर्य और पृथ्वी के बीच स्थित एल-1 बिंदु पर तैनात है और लगातार सूर्य की गतिविधियों पर नजर रखता है। इससे सोलर फ्लेयर्स की समय रहते पहचान करने और सैटेलाइट्स को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।
इसरो के अनुसार, आम लोगों पर इन सोलर फ्लेयर्स का कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। केवल ऊंचाई वाले या ध्रुवीय क्षेत्रों में कुछ समय के लिए रेडियो और जीपीएस सेवाओं में हल्की बाधा आ सकती है। सामान्य दैनिक जीवन और तकनीकी सेवाएं सामान्य रूप से काम करती रहेंगी।



