विवाह के दौरान जन्मे बच्चे कानूनी रूप से पहले पति की संतान ही होंगे: बिलासपुर हाईकोर्ट

बिलासपुर। पितृत्व निर्धारण को लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि विवाह के दौरान जन्मे बच्चों को कानूनी रूप से पति की ही संतान माना जाएगा, भले ही महिला किसी अन्य पुरुष के साथ लिव-इन में रही हो या दूसरा पुरुष बच्चों को अपनी संतान के रूप में स्वीकार कर ले। बच्चों की कानूनी वैधता पहले पति से ही जुड़ी रहेगी।
अदालत ने कहा कि यदि किसी महिला का विवाह कानूनी रूप से अस्तित्व में है और उसका विधिवत विच्छेद नहीं हुआ है, तो उस अवधि में जन्मे बच्चों को पति की संतान मानने की मजबूत कानूनी धारणा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत लागू होती है। इस धारणा को केवल ठोस और विश्वसनीय चिकित्सकीय साक्ष्यों के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है, जो इस मामले में प्रस्तुत नहीं किए गए।
मामले में दो महिलाओं ने स्वयं को एक कारोबारी की बेटियां और अपनी मां को उसकी वैध पत्नी घोषित करने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि महिला का पहला विवाह वर्ष 1960 में हुआ था, जो कभी कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ। न तो तलाक का कोई प्रमाण प्रस्तुत किया गया और न ही पहले पति की मृत्यु का कोई साक्ष्य दिया गया। ऐसी स्थिति में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 और 11 के तहत दूसरा विवाह शून्य माना जाएगा।
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि आधार कार्ड सहित अन्य सरकारी दस्तावेजों में बच्चों के पिता के रूप में पहले पति का ही नाम दर्ज है। केवल दूसरे पुरुष द्वारा संतान के रूप में स्वीकार करने से वैधानिक प्रावधानों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी और कहा कि वैधानिक नियमों और साक्ष्यों के सही मूल्यांकन के आधार पर निचली अदालत का निर्णय उचित है। इसके साथ ही स्पष्ट किया गया कि अपीलकर्ताओं को कथित दूसरे पति की संपत्ति या उत्तराधिकार पर कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं होगा।



