Raipur

महाविद्यालय में चंद्रशेखर आजाद को किया गया याद…

राजिम। शासकीय राजीव लोचन स्नातकोत्तर महाविद्यालय राजिम इस वर्ष को स्वर्ण जयंती वर्ष के रूप में मना रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में नैक/आइ.क्यू.ए.सी व इतिहास विभाग के संयुक्त तत्वावधान में महाविद्यालय में चंद्रशेखर आजाद की जयंती मनाई गई। इस कार्यक्रम में सर्वप्रथम संस्था प्रमुख डॉ. सोनिता सत्संगी ने चंद्रशेखर आजाद को याद करते हुए कहा कि चंद्रशेखर को ‘आजाद’ नाम एक खास वजह से मिला।

चंद्रशेखर जब 15 साल के थे, तब उन्‍हें किसी केस में एक जज के सामने पेश किया गया। वहां पर जब जज ने उनका नाम पूछा तो उन्होंने कहा, ‘मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता और मेरा घर जेल है’। जज ये सुनने के बाद भड़क गए और चंद्रशेखर को 15 कोड़ों की सजा सुनाई, यही से उनका नाम आजाद पड़ गया। चंद्रशेखर पूरी जिंदगी अपने आप को आजाद रखना चाहते थे।

नैक प्रभारी डॉ. गोवर्धन यदु ने कहा कि चंद्रशेखर आज़ाद युवाओं के लिये प्रेरणा स्रोत थे, युवाओं मे स्वतंत्रता का अलख जगाने मे उनकी अग्रणी भूमिका रही।

अंग्रेजों से लड़ाई करने के लिए चंद्रशेखर आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में सुखदेव और अपने एक अन्य साथियों के साथ बैठकर आगामी योजना बना रहे थे। इस बात की जानकारी अंग्रेजों को पहले से ही मिल गई थी। जिसके कारण अचानक अंग्रेज पुलिस ने उन पर हमला कर दिया। आजाद ने अपने साथियों को वहां से भगा दिया और अकेले अंग्रेजों से लोहा लगने लगे। इस लड़ाई में पुलिस की गोलियों से आजाद बुरी तरह घायल हो गए थे। वे सैकड़ों पुलिस वालों के सामने 20 मिनट तक लड़ते रहे थे।

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उन्होंने संकल्प लिया था कि वे न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी। इसीलिए अपने संकल्प को पूरा करने के लिए अपनी पिस्तौल की आखिरी गोली खुद को मार ली और मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दे दी। आजाद ने जिस पिस्‍तौल से अपने आप को गोली मारी थी, उसे अंग्रेज अपने साथ इंग्‍लैंड ले गए थे, जो वहां के म्‍यूजियम में रखा गया था, हालांकि बाद में भारत सरकार के प्रयासों के बाद उसे भारत वापस लाया गया, अभी वह इलाहाबाद के म्‍यूजियम में रखा गया है। ऐसे वीर सपूत को हमारा नमन है।

इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक आकाश बाघमारे ने बताया कि चन्द्रशेखर आजाद हमारे देश के सच्चे देशभक्त व क्रांतिकारी थे। चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ था। इन्‍होंने अपना पूरा जीवन देश की आजादी की लड़ाई के लिए कुर्बान कर दिया।

चंद्रशेखर बेहद कम्र उम्र में देश की आजादी की लड़ाई का हिस्सा बने थे। जब सन् 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने अपना आंदोलन वापस ले लिया तो आज़ाद का कांग्रेस से मोहभंग हो गया। इसके बाद वे पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल और शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेश चन्द्र चटर्जी द्वारा 1924 में गठित हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए। इस एसोसिएशन के साथ जुड़ने के बाद चंद्रशेखर ने रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काकोरी कांड (1925) में पहली बार सक्रिय रूप से भाग लिया।

इसके बाद चंद्रशेखर ने 1928 में लाहौर में ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर एसपी सॉन्डर्स को गोली मारकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया। इन सफल घटनाओं के बाद उन्होंने अंग्रेजों के खजाने को लूट कर संगठन की क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाना शुरू कर दिया। चंद्रशेखर का मानना था कि यह धन भारतीयों का ही है जिसे अंग्रेजों ने लूटा है।

इस कार्यक्रम में प्रो. एम. एल. वर्मा, गोपाल राव उरकुरकर, मुकेश कुर्रे, डॉ. देवेंद्र देवांगन, आलोक हिरवानी, नेहा सेन, श्वेता खरे व अन्य प्राध्यापकगण तथा राजू, हुमन, दिलीप, तेज व अन्य विद्यार्थीगण उपस्थित थे।

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